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Friday, 17 November 2017

जानें, क्रिकेट के इन पुराने नियमों से शायद आप वाकिफ हो

हाल ही में आइसीसी ने क्रिकेट के कुछ नियमों में बदलाव किया है। आइसीसी क्रिकेट की लोकप्रियता को बढ़ाने और उसमें फैंस की दिलचस्पी बरकरार रखने के लिए थोड़े-थोड़े समय के बाद ऐसा करती रहती है। क्रिकेट के कुछ नियम तो ऐसे हैं। जिनके बदल जाने का बावजूद भी फैंस को वो याद हैं। चलिए जानते हैं ऐसे ही कुछ नियमों के बारे में।



6 दिन का टेस्ट मैच
सन 1980 से पहले टेस्ट मैच छह ही दिन के हुआ करते थे। पांच दिन मैच के और एक दिन रेस्ट का। लेकिन 1980 के बाद इस नियम को बदल दिया गया और रेस्ट डे को खत्म कर दिए जाने से टेस्ट मैच पांच दिनों का हो गया।

60-60 ओवर का वनडे मैच
वनडे क्रिकेट की शुरुआत 1971 में हुई। तब एकदिवसीय मैचों में एक पारी 60 ओवर की हुआ करती थी। लेकिन 1977 में इस नियम में बदलाव कर 60 ओवर की जगह 50 ओवर का कर दिया गया। पहला 50 ओवर (6 गेंद प्रति ओवर) का मैच पाकिस्तान और वेस्टइंडीज के बीच खेला गया था।

बाउंसर के नियमों में भी हुए बदलाव
वनडे क्रिकेट की शुरुआत में पहले एक ओवर में सिर्फ एक बाउंसर फेंकी जा सकती थी दूसरी बाउंसर को नो-बॉल करार दे दिया जाता था। लेकिन हाल ही में आइसीसी ने इसे बदलते हुए बाउंसर की संख्या बढ़ा दी है। यानी कि अब कोई भी गेंदबाज एक ओवर में दो बाउंसर फेंक सकता है।

बदला गेंदों के इस्तेमाल का भी अंदाज़
वनडे क्रिकेट में गेंदों को लेकर भी नियमों में बदलाव किए गए हैं। पहले भी वनडे क्रिकेट में दो ही गेंदों का प्रयोग किया जाता था। लेकिन उनका इस्तेमाल अलग तरह से किया जाता था। पहले शुरुआती 30 ओवर तक तो दो गेंदों का इस्तेमाल किया जाता था। आखिर के 20 ओवरों में किसी एक गेंद से मैच खेलना होता था। लेकिन अब ये नियम बदल गया है। वनडे क्रिकेट में अब दोनों साइड से अलग-अलग गेंदों से मैच खेला जाता है।

पॉवरप्ले का नियम भी बदला
पहले वनडे क्रिकेट में 15 ओवर तक सिर्फ दो ही खिलाड़ी 30 यार्ड के घेरे के बाहर रह सकते थे। 1996 विश्व कप में श्रीलंका के दोनों ओपनर रोमेश कालूविथार्ना और सनथ जयसूर्या ने इन 15 ओवरों का ऐसा फायदा उठाना शुरु किया कि क्रिकेट में पहले 15 ओवरों के मायने ही बदल गए। ये दोनों ही विरोधी टीमों पर मैच की शुरुआत से ही तेज-तर्रार हमले करने की रणनीति को दुनिया के सामने लाए और नतीज़ा ये हुआ कि श्रीलंका की टीम 1996 का विश्व कप भी जीत गई।
अब एकदिवसीय मैचों में तीन पॉवरप्ले होते हैं। पहला पॉवरप्ले 1-10 ओवर तक होता है जिसमें सिर्फ दो खिलाड़ी ही 30 यार्ड सर्किल से बाहर होते हैं। दूसरा पॉवरप्ले 11-40 ओवर तक, इसमें 4 खिलाड़ी 30 यार्ड सर्किल से बाहर होते हैं। तीसरा पॉवरप्ले 41-50 ओवर का होता है। इसमें 30 यार्ड सर्किल के बाहर 5 फील्डर रख सकते हैं।

टी-20 का ये यादगार नियम भी गया बदल
टी-20 क्रिकेट तो रोमांच से भरपूर है और आइसीसी ने इसे और रोमांचक बनाने के लिए इसमें भी बदलाव कर दिए हैं। 2007 टी-20 विश्व कप में भारत और पाकिस्तान का मैच टाई होने के बाद दुनिया ने पहली बार वो कमाल देखा जब मैच टाई होने के बाद भी मैच का निर्णय निकल गया और ये रिजल्ट निकला बॉल आउट से। बॉल आउट में एक टीम को विकेट हिट करने के लिए पांच मौके दिए जाते थे और पिच पर गेंदबाज़ तो गेंद फेंकता था लेकिन कोई बल्लेबाज़ वहां पर नहीं होता था और गेंदबाज़ को सिर्फ विकेट चटकानी होती थी। जो भी टीम स्टंप्स को ज़्यादा पर हिट करती वो मैच की विजेता बन जाती।
लेकिन आइसीसी ने क्रिकेट के इस सबसे छोटे फॉर्मंट को और भी ज़्यादा मजेदार बनाने के लिए इसमें भी बदलाव कर दिया है। अब मैच टाई होने के बाद सुपर ओवर से मैच का निर्णय निकाला जाता है।

डंडे के बल पर गुलदार के जबडे से मां को खींच लाया अर्जुन

अपनी मां को बचानेे के लिए टिहरी का अर्जुन गुलदार से भिड़ गया। 17 वर्षीय अर्जुन ने डंडे के बल पर गुलदार को खदेड़ दिया।

मां को बचाने के लिए डंडे के बल पर गुलदार से भिड़ने वाले बडियार मालगांव निवासी अर्जुन सिंह पूरे टिहरी सहित पूरे क्षेत्र में वीरता का प्रतीक है। इस बाल दिवस दैनिक जागरण अर्जुन की बहादुरी को सलाम करता है।  
मामला 16 जुलाई, 2014 का है। जब रात के आठ बजे घर के आंगन में धमके गुलदार ने अर्जुन की मां विक्रमा देवी पर हमला कर दिया। यह देख अर्जुन ने डंडा उठाया और मां को बचाने के लिए गुलदार पर हमला बोल दिया। इससे घबराकर गुलदार को भागना पड़ा। इस दिलेरी के चलते राजकीय इंटर कॉलेज मथकुड़ीसैंण में कक्षा 12 में पढ़ रहे 17 वर्षीय अर्जुन का चयन राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार के लिए किया गया। 

विकासखंड भिलंगना के बडियार मालगांव के अर्जुन सिंह की विक्रमा देवी राजकीय इंटर कालेज मथकुड़ीसैंण में भोजनमाता है। पति के मौत के बाद विक्रमा देवी ने ही चारों बच्चों की परवरिश की। 

बदली सोच बनी प्रेरणा: नवजात बेटे को गोद देकर बेटी को अपनाया

हरियाणा में बेटियों के प्रति सोच मे बदलाव आ रहा है। फतेहाबाद के किरढाना में एक दंपती ने बेटा पैदा होने पर उसे अन्‍य दंपती को गोद दे दिया और उनकी बेटी को अपना लिया।
फतेहाबाद [मणिकांत मयंक]। समाज वाकई बदल रहा है। इसके साथ बदल रही है लोगों की सोच और बेटियों के प्रति नजरिया। वह भी ऐसे समाज के लोगों का, जहां बेटों की चाह में बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। इस माहौल के बीच सोच में बदालाव की रोशनी भी दिख रही है। एेसी की नई सोच के प्रतिनिधि हैं जिले के किरढान गांव के अनूप सिंह और उनकी पत्‍‍नी सीता। दोनों ने अपने नवजात बेटे को किसी और दंपती को गाेद दे दिया और उनकी बेटी को गोद ले लिया।

इस दंपती ने बेटी की चाह में दूसरे बच्चे को जन्म देने का फैसला लिया। ले‍किन, इस बार भी बेटा ही पैदा हुआ। इसके बाद इस दंपती ने मिसाल कायम करते हुए अपने नवजात बेटे के बदले बेटी गोद ले ली। उनका बेटा जिनकी गोद में गया है, उनकी भी चाहत पूरी हो गई। दूसरा परिवार हिसार के गांव किशनगढ़ का रहने वाला है।
दोनों परिवार एक ही समाज से हैं, लेकिन आपस में पहले से कोई रिश्तेदारी व जान-पहचान नहीं थी। अस्पताल में ही दोनों परिवारों का परिचय हुआ। मगर आज दोनों परिवारों के बीच कोई गहरा रिश्ता कायम हो गया है।
हुआ यूं कि भट्टूकलां के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में गांव किशनगढ़ (हिसार) निवासी भूप सिंह की पत्नी रेनू को डिलीवरी के लिए लाया गया था।
दोनों के पहले से तीन बेटियां हैं। उनकी हसरत थी कि बेटियों का एक भाई हो। ले‍किन,11 नवंबर को डिलीवरी हुई तो घर में लक्ष्मी आई। अगले दिन महिला को अस्पताल से छुट्टी भी मिल गई। इसके दो दिन बाद 14 नवंबर को किरढ़ान निवासी अनूप सिंह की पत्‍नी सीता  ने बेटे को जन्म दिया। हालांकि परिवार की इच्छा बेटी की थी।
सीता के ससुर लालचंद ने बताया कि उसके लड़की नहीं हुई थी, इसलिए चाह थी कि उसके घर पोती जन्म ले। इसी बीच उन्हें पता चला कि किशनगढ़ के एक दंपती को बेटे की चाहत थी अौर उनके बेटी पैदा हो गई। बस, यहीं से उनके मन में एक विचार आया। इसके बाद अनूप सिंह के परिवार ने भूप सिंह से संपर्क किया। अनूप में भूप के समक्ष प्रस्‍ताव रखा कि वह उनके बेटे को गोद ले ले और अपनी बेटी उसे गोद दे दी। दोनों में इस पर सहमति बन गई। अनूप ने भूप सिंह की लड़की गोद ले ली और अपना नवजात बेटा भूप को गोद दे दिया।
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कानूनी प्रक्रिया बाद में पूरी करेंगे
हालांकि स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड में सीता को लड़का व रेनू को लड़की पैदा होने की बात दर्ज है और इनका आधार कार्ड भी यही बनेगा। गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया बाद में पूरी की जाएगी। लालचंद कहते हैं कि बेटियों के बिना आंगन ही सूना नजर आता है।
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कानूनी प्रक्रिया पूरी करनी होगी : एडॉप्शन अफसर
एडॉप्शन अफसर पूनम बताती हैं कि बच्चा गोद लेने की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के तहत पहले तो सेंट्रल एडॉप्शन रिसोर्स अथॉरिटी (कारा) की वेबसाइट में पंजीकरण करवाना पड़ता है। फिर कोर्ट से विधिवत आदेश लेना पड़ता है। इस कोर्ट आर्डर को भी कारा की वेबसाइट पर डाउनलोड करना पड़ेगा। तब जाकर कारा से मंजूरी मिलेगी। इसमें बच्चों का भी कल्याण सन्निहित है।

Monday, 13 November 2017

150 साल का समय लगा था इस शिव मंदिर को तैयार होने में...जानें मंदिर की और भी खास बातें...

कैलाश मंदिर संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (760-753 ई.) ने निमित्त कराया था। यह एलोरा जिला औरंगाबाद स्थित लयण-श्रृंखला में है। एलोरा की 34 गुफाओं में सबसे अदभुत है कैलाश मंदिर। विशाल कैलाश मंदिर देखने में जितना खूबसूरत है उससे ज्यादा खूबसूरत है इस मंदिर में किया गया काम। कैलाश मंदिर की खास बात यह है कि इसे इस विशालकाय मंदिर को तैयार करने में करीब 150 साल लगे और करीब 7000 मजदूरों ने लगातार इस पर काम किया। आइए जानते हैं इस मंदिर के बारे में खास बातें।


कहां है कैलाश मंदिर
एलोरा का कैलाश मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में प्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं में स्थित है। यह एलोरा के 16वीं गुफा की शोभा बढ़ा रही है। इसका काम कृष्णा प्रथम के शासनकाल में पूरा हुआ। कैलाश मंदिर में अति विशाल शिवलिंग देखा जा सकता है।

भगवान शिव को समर्पित है मंदिर
कैलाश मंदिर को हिमालय के कैलाश का रूप देने का भरपूर प्रयास किया गया है। शिव का यह दो मंजिला मंदिर पर्वत चट्टानों को काटकर बनाया है। यह मंदिर दुनिया भर में एक ही पत्थर की शिला से बनी हुई सबसे बड़ी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।

कैसे बना है ये मंदिर
90 फीट है इस अनूठे मंदिर की ऊंचाई, 276 फीट लम्बा, 154 फीट चौड़ा है यह गुफा मंदिर। 150 साल लगे इस मंदिर के निर्माण में और दस पीढ़ियां लगीं। 7000 कामगारों ने लगातार काम करके तैयार किया है ये मंदिर।


आजतक इस मंदिर में कभी पूजा किए जाने का प्रमाण नहीं मिलता। आज भी इस मंदिर में कोई पुजारी नहीं है। कोई नियमित पूजा पाठ का कोई सिलसिला नहीं चलता।

पत्थर को काटकर बनाया था मंदिर
इसके निर्माण में करीब 40 हज़ार टन वजनी पत्थरों को काटकर 90 फुट ऊंचा मंदिर बनाया गया। इस मंदिर के आंगन के तीनों ओर कोठरियां हैं और सामने खुले मंडप में नंदी विराजमान है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हैं।


नक्काशी है भव्य
एलोरा की गुफा-16 यानि कैलाश मंदिर सबसे बड़ी गुफा है, जिसमें सबसे ज्यादा खुदाई कार्य किया गया है। यहां के कैलाश मंदिर में विशाल और भव्‍य नक्काशी है। कैलाश मंदिर ‘विरुपाक्ष मंदिर’ से प्रेरित होकर राष्ट्रकूट वंश के शासन के दौरान बनाया गया था

चलिए जानें क्‍या होते हैं मूल नक्षत्र



सरल भाषा में समझें तो दो नक्षत्रों में अलगाव और जुड़ाव होता है मूल। 10 नवंबर की दोपहर 12बज कर 25 मिनट पर द्वंद मूल की शुरूआत हो गई है।
 शुरू हुए मूल 
10 नवंबर 2017 को दोपहर 12 बज 25 मिनट से द्वंदमूल की शुरूआत हो गई है और ये रविवार को 11 बज कर 32 मिनट तक रहेंगे। मूल नक्षत्र का स्वामी केतु है  और राशि स्वामी गुरु है। जब केतु गुरु धनु राशि में उच्च का होता है तो इसकी दशा 7 वर्ष की होती है। इस के बाद सर्वाधिक 20 वर्ष की दशा शुक्र की लगती है । जीवन में इन्ही दशाओं का महत्व अधिक होता है। यह दशा इनके जीवन में विद्या भाव को बढ़ाने वाली होती है और इसी दशा में बचपन से युवावस्था आती है। उपरोक्‍त अवधि में यदि कोई बच्‍चा जन्‍म लेता है तो उस शिशु का जन्‍म मूल नक्षत्र में होता है। 

अपने आप में शुभ अशुभ नहीं होते मूल 
पंडित दीपक पांडे की मानें तो मूल अपने आप में अशुभ नहीं होते उनका किन ग्रहों, राशियों या नक्षत्रों से योग होता है उसके अनुसार उनका प्रभाव निश्‍चित होता है। ज्योतिषशास्त्र में गण्डमूल नक्षत्र के अंतर्गत अश्विनी, रेवती, अश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा और मूल नक्षत्र को रखा गया है। अगर बच्चे का जन्म गण्डमूल नक्षत्र में हो तो एक महीने के अंदर जब भी वह नक्षत्र लौटकर आए तो उस दिन गण्डमूल नक्षत्र की शांति करा लेनी चाहिए। अन्यथा इसका अशुभ परिणाम हो सकता है। शतपथ ब्राह्मण और तैत्तिरीय ब्राह्मण नामक ग्रंथ में बताया गया है कुछ स्थितियों में यह दोष अपने आप समाप्त हो जाता है। इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले व्यक्ति खुद के लिए भाग्यशाली होता है। व्यक्ति का जन्म अगर वृष, सिंह, वृश्चिक अथवा कुंभ लग्न में हो तब मूल नक्षत्र में जन्म होने पर भी इसका अशुभ फल प्राप्त नहीं होता है।
राहु केतु का प्रभाव 
केतु एक छाया ग्रह है पुराणिक मतानुसार यह राहु का धड़ है, जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से यह दक्षिणी ध्रुव का कोना है। यह धनु राशि में उच्च, मिथुन में नीच का, मीन में स्वराशिस्थ और कन्या में शत्रु राशिस्थ होता है। केतु स्वतंत्र फल देने में सक्षम नहीं होता यह जिसके साथ होगा वैसा परिणाम देगा। धनु में केतु व गुरु भी साथ हो या मीन राशि में या कर्क में उच्च का हो तो उसके प्रभाव को दुगना कर जहाँ भी स्थित होगा उत्तम परिणाम देगा। इसमें जन्‍म लेने वाला जातक ईमानदार लेकिन जिद्दी स्वभाव का होगा। ये लोग वकील, जज, बैंक कर्मी, प्रशासनिक सेवाओं में, कपड़ा व्यापार, किराना आदि के क्षेत्र में सफल होते हैं।


Saturday, 4 November 2017

आज ही शिवजी बने थे त्रिपुरारी, जानें कार्तिक पूर्णिमा का महत्‍व

कार्ति‍क पूर्णि‍मा का गुरु नानक जी के जन्म के अलावा भी महत्‍व है। यह द‍िन भगवान श‍िव के एक अवतार से भी जुड़ा है। आइए जानें इस द‍ि‍न का महत्‍व...

शि‍व जी को त्रिपुरारी नाम द‍िया गया ह‍िंदू धर्म में कार्तिक पूर्णिमा को गुरू नानक देवजी के जन्‍मदिन के रूप में मनाया जाता है। इस द‍िन को प्रकाश पर्व के नाम से भी जानते हैं। वहीं इस द‍िन के और भी आध्‍यात्‍मि‍क रूप से महत्‍व हैं। पौराणिक कथाओं में इस बात का जि‍क्र म‍िलता है क‍ि इस द‍िन भगवान श‍िव को त्रिपुरारी नाम म‍िला था। जी हां एक बार त्रिपुरासुर नामक महाबलशाली का अत्‍याचार बहुत बढ़ा था। इस दौरान सभी देवतागणों ने भगवान श‍िव से व‍िनती की थी। इस पर श‍िव जी ने उस महाबलशाली असुर का अंत इसी दिन किया था। इसके बाद सभी देवताओं ने उन्‍हें त्रिपुरारी नाम द‍िया था।


व‍िष्‍णु जी ने ल‍िया था पहला अवतार
वहीं कार्तिक पूर्णिमा में भगवान विष्‍णु की भी पूजा होती है। शास्‍त्रों के मुताबि‍क इस द‍िन ही भगवान व‍िष्‍णु ने अपना पहला अवतार ल‍िया था। पहले अवतार में व‍िष्‍णु जी मत्‍स्‍य यानी मछली के रूप में प्रकट हुए थे। इसल‍िए इस द‍िन भगवान व‍िष्‍णु की पूजा-अर्चना की जाती है। इससे व‍िशेष फल मि‍लता है। इस का महत्‍व महाभारत काल से भी जुड़ा है। मान्‍यता है क‍ि इस दिन पांडवों ने महाभारत युद्ध में मारे गए अपनों की आत्मा की शांति के लिए गढ़मुक्तेश्वर में श्राद्ध कर्म कि‍या था। 


जानिए, किस देश के क्रिकेट बोर्ड के पास है कितनी दौलत

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की ताकत दुनिया में किसी से नहीं छिपी है। खासकर अगर बात हो एशिया के देशों की, तो यहां पर क्रिकेट का अपना अलग ही जलवा है। बीसीसीआइ दुनिया का सबसे अमीर और ताकतवर क्रिकेट बोर्ड है। इस वजह से भारतीय क्रिकेटर भी अच्छी खासी कमाई करते हैं। आइए नजर डालते हैं टेस्ट दर्जा प्राप्त देशों में किस क्रिकेट बोर्ड की कमाई सबसे ज्यादा है-

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड
बीसीसीआई विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है, लेकिन शुरुआत में ऐसा नहीं था। भारत ने जब 1983 में विश्वकप जीता उसके बाद से बीसीसीआई के पास पैसे की कमी कभी नहीं हुई। 2008 में शुरू हुए आइपीएल ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड बना दिया। बीसीसीआई का आज नेट वर्थ 295 मिलियन यूएस डॉलर है और इस तरह यह विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है।

साउथ अफ्रीका क्रिकेट बोर्ड
दक्षिण अफ्रीका विश्व का सबसे खर्चीला क्रिकेट बोर्ड है। शायद यही कारण है कि कई बार इसके पास पैसों की कमी हो जाती है। यह बोर्ड अधिकतर पैसा टेलीविजन राइट्स व दूसरी टीमों के दौरे पर आने से कमाता है। इस बोर्ड का नेट वर्थ 69 मिलियन यूएस डॉलर है।

इंग्लैंड एंड वेल्स क्रिकेट बोर्ड
ईसीबी विश्व के तीन सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड में से एक है। इंग्लैंड ही क्रिकेट का जन्मदाता है। इसी बोर्ड ने टी20 क्रिकेट को लोगों तक पहुंचाया। इस क्रिकेट बोर्ड का नेट वर्थ 59 मिलियन यूएस डॉलर है। इंग्लैंड में 2019 क्रिकेट विश्व कप का आयोजन किया जाएगा।

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड
पिछले कुछ वर्षों से आतंकवाद के साए में ढका पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड अपनी घरेलू सीरीज का आयोजन मिडिल ईस्ट देशों में करा रहा है। पाक में क्रिकेट प्रेमी हैं, जिस वजह से बोर्ड अच्छा खासा पैसा कमा लेता है। पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ज्यादातर पैसे टेलीविजन राइट्स बेचकर कमाता है। इस बोर्ड का नेट वर्थ 55 मिलियन यूएस डॉलर है।

ऑस्ट्रेलिया क्रिकेट बोर्ड
क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है और यह देश की सबसे अमीर खेल संस्था है। ऑस्ट्रेलिया की टीम ने हमेशा बेहतरीन क्रिकेट खेला है। क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने पहली बार केएफसी टी20 बैश लीग शुरू की थी, जिसको पूरे विश्व से अच्छा रेस्पॉन्स मिला था। इस बोर्ड का नेट वर्थ 24 मिलियन यूएस डॉलर है।

श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड
विश्व की चुनिंदा टीमों में से एक श्रीलंका की टीम ने देश-विदेश में अपना नाम कमाया है। श्रीलंका क्रिकेट बोर्ड का नेट वर्थ 20 मिलियन यूएस डॉलर है। इस बोर्ड की ज्यादातर कमाई टेलीविजन प्रसारण अधिकारों से होती है। श्रीलंका क्रिकेट टीम की हालत इस समय खराब है, जिसकी वजह से बोर्ड और चयन समिति परेशानी के दौर से गुजर रही है।

वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड
वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड विश्व का सातवां सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड है। इस बोर्ड का नेट वर्थ 15 मिलियन डॉलर है। वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड के अंतर्गत कई कैरेबियन देश आते हैं। वेस्टइंडीज 1970 से 1990 तक विश्व की बेहतरीन टीमों में से एक रही है। पिछले कुछ वर्षों से वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड पैसे नहीं कमा पा रहा है, जिस कारण आए दिन बोर्ड और उसके खिलाड़ियों में झगड़े होते रहते हैं। वेस्टइंडीज क्रिकेट बोर्ड ने हाल ही में नई फ्रेंचाइजी डब्ल्यूआईपीबी शुरू की है और उसे उम्मीद है कि इसकी सहायता से वह एक बार फिर से देश के युवाओं के दिलों में क्रिकेट को जिंदा करेगा।

न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड
न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड की बात करें, तो यह बोर्ड अन्‍य देशों के मुकाबले बेहद कम पैसा बना पाता है। इस बोर्ड का नेट वर्थ 9 मिलियन यूएस डॉलर है, न्यूजीलैंड में रग्बी ज्यादा पसंद की जाती है। कीवी क्रिकेटर्स अपने अच्छे खेल के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं और अलग-अलग लीग से भी मोटा पैसा कमाते हैं। वहीं, यह बोर्ड अपनी ज्यादातर कमाई के लिए टेलीवीजन राइट्स पर निर्भर है।


Friday, 3 November 2017

Pics: क्रिकेटर्स के इन नामों को सुनकर चौंक जाएगें आप, कोई है ‘पोपट’ तो कोई है टूग्गा

क्रिकेट की दुनिया में ज्यादातर क्रिकेटरों के दो-दो नाम होते हैं। एक होता है उनका रियलनेम तो एक होता है निकनेम। आज हमको आपको क्रिकेटर्स के निकनेम बताने जा रहे हैं। इनमें से कई क्रिकेटर्स के नाम जानकर तो आप हो जाएंगे हैरान। आइए आज हम आपको बताते हैं इस क्रिकेटरों के बारे में और उनके निकनेम के बारे में।



आशीष नेहरा- पोपट
सौरव गांगुली ने आशु को नाम दिया 'पोपट' क्योंकि वह बहुत ज्यादा बोला करते थे। वह पानी के अंदर भी बोल सकते थे और मजाकिया भी खूब थे। मेरे लिए उन्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी। उनकी शारीरिक भाव-भंगिमाएं ही हंसाने के लिए काफी थीं। अगर आप नेहरा के साथ हैं तो आपका दिन खराब नहीं जा सकता। वह बंदा आपको हंसा-हंसा करके गिरा देगा।

माइकल होल्डिंग- मौत की सनसनी
वेस्टइंडीज के इस तेज गेंदबाज को चुपचाप गेंदबाजी करने के लिए जाना जाता था। माइकल को अंपायर डिकी बर्ड ने यह नाम तब दिया था जब क्रीज के पास खड़े रहने के बावजूद उन्हें माइकल होल्डिंग के दौड़ के आने की भनक तक नहीं लगती थी।

ग्लैन मैक्ग्रा- पिजन
ऑस्ट्रेलिया के इस तेज गेंदबाज को नीक नेम कबूतर करियर के शुरूआती दौर में ही मिल गया था जब उनकी टीम के सदस्यों ने बालिंग के दौरान उनके लंबे पतले टांगों को देखते हुए पिजन का उपनाम दिया था

स्टीव वॉ- टुग्गा
स्टीव वॉ को खेल के मैदान पर मुश्किल परिस्थितियों में भी मुस्कुराने के लिए जाना जाता था। वह ऑस्ट्रेलिया के इस धाकड़ बल्लेबाज को क्रिकेट फिल्ड पर शांत और धैर्य से मुश्किलों का सामना करने के लिए उनके साथियों द्वारा दिया गया था उपनाम।

राहुल द्रविड़ - द वॉल
राहुल द्रविड़ को टीम इंडिया की दीवार माना जाता था, क्योंकि जब भी टीम संकट में होती थी द्रविड़ एक छोर थामे रखते थे। इसी वजह से उनका नाम 'द वॉल' पड़ गया. द्रविड़ का एक दूसरा निकनेम जैमी इसलिए पड़ा क्योंकि उनके पिता जैम बनाने वाली कंपनी 'किसान' में काम करते थे।

शाहिद आफरीदी- बूम बूम
पाकिस्तान के तुफानी ऑलराउंडर शाहिद आफरीदी गेंद की बेरहमी से धुनाई के कारण बूम-बूम कहे जाते हैं। वो जब भी क्रीज पर आते हैं तो या को खुद जल्दी पैवेलियन लौट जाते हैं या फिर अपने बल्ले से गेंद को पैवेलियन का रास्ता दिखा देते हैं। बैटिंग की अपनी आक्रामक शैली के कारण बूम-बूम खासे चर्चा में रहते हैं।

अनिल कुंबले- जंबो
भारत के दिग्गज लेग स्पिनर अनिल कुंबले को यह नाम हरफनमौला नवजोत सिंह सिद्धू ने दिया था। कुंबले की गेंदें जिस तरह से अचानक बाउंस करती थीं, उससे अच्छे-अच्छे बल्लेबाज भी चकमा खा जाते थे।

विराट कोहली- चीकू
विराट कोहली को प्यार से चीकू कहकर बुलाया जाता है। कप्तान धौनी और टीम के दूसरे खिलाड़ी भी उन्हें प्यार से चीकू ही बुलाते है। विराट कोहली का यह निकनेम दिल्ली के कोच अजीत चौधरी ने दिया था। उन्होंने विराट का यह नाम उनकी हेयर स्टाइल को देखते हुए रखा था।

महेंद्र सिंह धौनी- कैप्टन कूल
मैदान पर हमेशा शांतचित रहने वाले टीम इंडिया के वनडे और टी-20 कैप्टन धौनी को विषम परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखने के लिए क्रिकेट विशेषज्ञों और फैन्स ने उन्हें कैप्टन कूल कहना शुरू कर दिया, जो उनके नाम के आगे अब लगभग हमेशा ही नजर में आता है।


युवी ने बताया नेहरा को ये कहकर बुलाते थे गांगुली, जानकर आप भी हंस पड़ेंगे

पिछले 18 बरस से लगातार मुस्कुराने वाले नेहरा जी अब क्रिकेट खेलते नजर नहीं आएंगे लेकिन उनसे जुड़ी कई कहानियां आने वाले कई साल तक क्रिकेट के मैदानों में गूंजा करेंगी। ऐसी ही कुछ किस्सों से उनके पुराने साथी और हरफनमौला खिलाड़ी युवराज सिंह ने पर्दा हटाया है। उन्होंने आशीष नेहरा की रिटायरमेंट के बाद फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखी जिसमें उनके बारे में कई ऐसी बातें लिखी गई हैं, जो हाल तक हमें नहीं पता थीं।
युवराज ने लिखा है कि सबसे पहली बात मैं जो अपने दोस्त आशु (आशीष नेहरा) के बारे में कहना चाहता हूं, वो ये कि वह बेहद ईमानदार हैं...वह दिल का बहुत साफ आदमी है। शायद पवित्र पुस्तक ही उनसे ज्यादा ईमानदार होगी। मैं जानता हूं इसे पढऩे के बाद इस बात पर कई लोगों को हैरानी हो सकती है।


ऐसा लगा उनकी पतलून में किसी ने कुछ डाल दिया है 
कई बार हम लोग जीवन को लेकर आलोचनात्मक हो जाते हैं। सार्वजनिक लोगों के लिए ये बात और लागू होती है जिन्हें कई पैमानों पर आंका जाता है। इस मामले में आशु भी कुछ लोगों से सीधी-सपाट बात करते थे और उन्हें इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। मेरी उनसे पहली मुलाकात अंडर-19 के दिनों में हुई थी और उन्हें भारतीय टीम के लिए चुना गया था। वह हरभजन सिंह के साथ रूम शेयर कर रहे थे। मैं भज्जी से मिलने गया तो इस लंबे कद के शख्स को देखा जो आराम से नहीं बैठ सकता था। वह एक पल बैठा होता और दूसरे पल स्ट्रेच करने लगता या चेहरा बनाने लगता या फिर आंखें घुमाने लगता। मुझे ये बड़ा मजेदार लगा और लगा कि उनकी पतलून में किसी ने कुछ डाल दिया है।

ज्यादा बोलने के कारण नाम पड़ा 'पोपट' 
सौरव गांगुली ने आशु को नाम दिया 'पोपट' क्योंकि वह बहुत ज्यादा बोला करते थे। वह पानी के अंदर भी बोल सकते थे और मजाकिया भी खूब थे। मेरे लिए उन्हें कुछ बोलने की जरूरत नहीं थी। उनकी शारीरिक भाव-भंगिमाएं ही हंसाने के लिए काफी थीं। अगर आप नेहरा के साथ हैं तो आपका दिन खराब नहीं जा सकता। वह बंदा आपको हंसा-हंसा करके गिरा देगा। 

सिकाई करके और टैपिंग करके लिए छह विकेट
युवराज ने आगे लिखा कि मैंने उन्हें कभी बताया नहीं, लेकिन मैं उनसे प्रेरणा लेता रहा हूं। मैं हमेशा सोचता था कि अगर कोई शख्स 38 साल की उम्र में तमाम चोट और सर्जरी के बाद तेज गेंदबाज़ी कर सकता है तो मैं 36 साल की उम्र में बल्लेबाजी क्यों नहीं कर सकता। उनकी 11 सर्जरी हुई जिनमें कोहनी, कूल्हा, टखना, अंगुली और दोनों घुटने शामिल हैं लेकिन कड़ी मेहनत और लगन ने उन्हें आगे बढ़ाना जारी रखा। मुझे याद है, साल 2003 के विश्व कप में उनका पैर मुड़ गया था और चोट लगी। इंग्लैंड के खिलाफ अगला मैच खेलने की कोई संभावना नहीं थी लेकिन वो सभी से कहते रहे कि वह खेलना चाहते हैं। अगले 72 घंटे में उन्होंने 30-40 बार बर्फ से सिकाई की, टैपिंग कराई, दवा खाई और चमत्कारिक रूप से खेलने के लिए तैयार हो गए। बाहर की दुनिया को लगा कि उन्हें फर्क नहीं पड़ता, लेकिन हमें पता था कि उनके लिए इसके क्या मायने थे। उन्होंने 23 रन देकर छह विकेट लिए और भारत जीत गया।

बल्लेबाज होते तो 45 तक खेलते
युवराज ने लिखा कि मैं उस तब बेतहाशा हंसता हूं जब वह अपनी शानदार बल्लेबाजी का जिक्र करते हैं। उन्होंने कई बार ये दावा किया था कि अगर वह बल्लेबाज होते तो 45 साल की उम्र तक खेलते। 


ये हैं साल 2017 के टॉप-10 भरोसेमंद ब्रैंड, जानिए

साल 2016 के अंत में कंपनी के भीतर हुए घमासान के बावजूद साल 2017 में टाटा ग्रुप ने एक भरोसेमंद कंपनी होने का रुतबा कायम रखा है
 नोटबंदी और जीएसटी के कारण भले ही कंपनियों के प्रदर्शन पर असर पड़ा हो, लेकिन अब भी देश में कुछ ऐसी कंपनियां हैं जिन्होंने ग्राहकों के मन में अपने भरोसे को बरकरार रखा है। ऐसी कंपनियों की सूची में टाटा ने अव्वल दर्जा हासिल किया है। हम अपनी इस खबर में आपको टाटा के अलावा उन अन्य कंपनियों के बारे में भी जानकारी दे रहे हैं जिन्होंने ग्राहकों के भरोसे को अब तक नहीं खोया है। ये डेटा इंटरब्रैंड्स बेस्ट इंडियन ब्रैंड रिपोर्ट 2017 के जरिए सामने आए हैं।
टाटा ने नहीं खोया अपना रुतबा: बीते साल सायरस मिस्त्री को टाटा संस के चेयरमैन पद से हटाने जाने के बाद हुई उथल-पुथल के बीच कंपनी की वैल्युएशन में साल 2016 के दौरान 274 करोड़ रुपए की कमी आई थी। लेकिन साल 2017 में 73,944 करोड़ रुपए के वैल्युएशन के साथ टाटा ने भरोसमंद कंपनी होने का रुतबा बरकरार रखा है।
टाटा संस के ब्रैंड संरक्षक हरीश भट्ट ने बताया, “टाटा एक ऐसा ब्रैंड हो जो कि नेतृत्व और भरोसे का पर्याय है। टाटा ब्रैंड की एक वैश्विक पहुंच है और यह तरह-तरह के बिजनेस करती है। बीते 149 सालों में टाटा ने अपने फाउंडर जमशेद जी टाटा के लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी कंपनी की तौर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है जो सब कुछ करती है।”
ये हैं साल 2017 के टॉप इंडियन ब्रैंड:

 

बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में चपरासी की बिटिया ने लहराया परचम

दैनिक जागरण से बातचीत में जूली ने बताया कि रातभर जग कर उसने न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी की। जूली बताती है कि उसने गरीबी को काफी करीब से देखा है।


बिहार न्यायिक सेवा परीक्षा में सिविल कोर्ट से सेवानिवृत्त चपरासी जगदीश साह की बेटी जूली साह ने परचम लहराया है। ईसीबी कोटे में उन्होंने 24वां स्थान हासिल किया है। जूली साह ने इंटर की पढ़ाई के दौरान ही ठान लिया था कि उसे जज बनना है। छह भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर रही जूली कहती है कि वह निष्पक्ष न्याय करेंगी।

दैनिक जागरण से बातचीत में जूली ने बताया कि रातभर जग कर उसने न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी की। जूली बताती है कि उसने गरीबी को काफी करीब से देखा है। जूली ने बताया कि उसकी शादी कजरैली में वर्ष 2009 में हुई थी। पति दिल्ली में प्राइवेट जॉब करते हैं। उसे सात साल का बेटा है। पढ़ने से पति ने भी मना नहीं किया। सास-ससुर ने भी साथ दिया। जूली के पिता जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में आइसीयू में 15 दिनों से जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। जूली उनके साथ है। उनकी आंखें तो खुलती हैं लेकिन वे कुछ बोल नहीं पाते।

मक्‍का मदीना में भी जिस के चमत्‍कार को लोगों ने किया सलाम

कार्तिक पूर्णिमा पर ही होता है प्रकाशपर्व यानि गुरू नानक देवजी का जन्‍मदिन। आइये जाने गुरू नानक के अनोखे चमत्‍कार के बारे में।
जब मक्‍का पहुंचे नानक साहब
कहते हैं कि एक बार सिक्‍खों के प्रथम गुरू श्री नानक देव जी यात्रा करते हुए मक्‍का मदीना पहुंच गए। जब वह मक्का पहुंचे तो शाम हो चुकी थी और उनके सभी सहयात्री काफी थकान का अनुभव कर रहे थे। मक्का में मुस्लिम समुदाय का प्रसिद्ध पवित्र स्थान काबा है। थकान के कारण गुरू नानक समेत सभी यात्री सोने के लिए लेट गए और उन्‍हें ये ध्‍यान नहीं रहा कि उनके पैर किस दिशा है। मुसलिम मान्‍यता में काबा की ओर पैर करके सोना मना है। उन्‍हें काबा की तरफ पैर किए देख कर एक मुस्‍लिम शख्‍स जिओन नाराज हो गया और क्रोध से बोला कि काफिर तू कौन है जो खुदा के घर की तरफ पैर करके सोया हुआ है।

जब काबा ने भी बदली दिशा
इस पर नानक देव जी ने विनम्रता के साथ कहा कि वे पूरे दिन के सफर के बाद थककर लेटे हैं और उन्‍हें नहीं मालूम की खुदा का घर किधर है। उन्‍होंने जिओन से कहा कि आप हमारे पैर पकड़कर उधर कर दे जिस तरफ खुदा का घर नहीं है। क्रोध में उसने उनके पैरों को घसीटकर काबा से विपरीत दिशा में कर दिया। इसके बाद जब उसने सर उठा कर देखा तो उसे काबा फिर नानक देव के पैरों की दिशा में ही दिखाई दिया। जब भी वो पैरों को दूसरी तरफ घुमाता और काबा भी घूम कर उसी दिशा में आ जाता। ये देख कर जिओन घबरा गया और भाग यह बात हाजी और दूसरे मुसलमानों को बताने पहुंचा।

मुस्‍लिम भी हुए मुरीद
इस बारे में जान कर काबा के मुख्य मौलवी इमाम रुकनदीन नानक देव जी से मिलने आये और कहा कि आप मुस्‍लिम नहीं है फिर भी यहां क्‍यों आये हैं। गुरू नानक ने कहा कि वे सभी शुद्ध आचरण वालों का सम्‍मान करते हैं और उनसे मिलने आये हैं। नानक जी के चमत्‍कार और व्‍यवहार को देख कर सभी बेहद प्रभावित हुए और उनके प्रशंसक बन गए। जब मौलवी ने उनसे पूछा कि हिंदू मुसलमान में कौन बेहतर है तो नानक देव जी ने कहा मानव मात्र से प्‍यार करने वाला सदाचारी ही श्रेष्‍ठ है चाहे वो किसी जाति का हो। उनकी सच्‍चाई और सादगी से प्रभावित हो कर काबा में भी लोग उनके मुरीद हो गए और कहते हैं इस चमत्‍कार के प्रमाण के रूप में आज भी उनकी खड़ाउ काबा में रखी है।   

Thursday, 2 November 2017

दुनिया में केवल ये 6 गेंदबाज ले सके हैं सबसे मुश्किल हैट्रिक, जानें कौन

टी-20 क्रिकेट में हैट्रिक लेने वाले पहले पाकिस्तान गेंदबाज फहीम अशरफ दुनिया के छठवें गेंदबाज हैं। उन्होंने इस कारनामे को श्रीलंका के खिलाफ दूसरे टी20 में अंजाम दिया। अशरफ से पहले जिन 5 गेंदबाजों ने टी-20 क्रिकेट में हैट्रिक अपने नाम की है उनमें 2 गेंदबाज श्रीलंका, दो गेंदबाज न्यूजीलैंड और एक गेंदबाज ऑस्ट्रेलिया से हैं। यही नहीं, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में 15 साल बाद ऐसा हो पाया है, जब किसी पाकिस्तान गेंदबाज ने हैट्रिक अपने नाम की हो।


टी-20 में हैट्रिक लेने वाले गेंदबाज-
टी-20 में सबसे पहली हैट्रिक ऑस्‍ट्रेलिया के पूर्व गेंदबाज ब्रेट ली के नाम है। ब्रेट ली ने साल 2007 में यह कारनामा किया था

    उसके बाद साल 2009 में न्‍यूजीलैंड के जैकब ओरम ने श्रीलंका के खिलाफ हैट्रिक ली थी।

    इसके बाद 2010 में एक और कीवी गेंदबाज टिम साउदी ने एक साल बाद पाकिस्‍तान के खिलाफ यह इतिहास रचा था।

    श्रीलंकाई क्रिकेटर थिसारा परेरा ने 2015-16 में भारत के खिलाफ हैट्रिक ली थी।

    2017 में बांग्‍लादेश के खिलाफ दूसरे टी-20 इंटरनेशनल मैच में मलिंगा ने इतिहास रचा। मलिंगा ने बांग्‍लादेश के तीन बल्‍लेबाजों को लगातार आउट करके टी-20 करियर की पहली हैट्रिक ली। मलिंगा को यह हैट्रिक लेने में 10 साल लग गए। मलिंगा इंटरनेशनल टी-20 में हैट्रिक लेने वाले श्रीलंका के दूसरे और दुनिया के पांचवें गेंदबाज बन गए थे।


    जिस बच्चे को दिया था ईनाम, आज उसी की कप्तानी में संन्यास लेंगे आशीष नेहरा

    भारत के तेज गेंदबाज आशीष नेहरा 1 नवंबर को 2017 के बाद क्रिकेट से संन्यास ले लेंगे। आशीष नेहरा ने रिटायरमेंट की घोषणा के बाद हम आपके लिए लेकर आए हैं नेहरा के करियर के सुनहरे पलों की यादें। 14 साल पहले साल 2003 में अंडर 16 के एक मैच में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए आशीष नेहरा ने विराट कोहली को सम्मानित किया था। नेहरा ने 1999 में टेस्ट मैच से अपने करियर की शुरूआत की थी। नेहरा अपने अजीब एक्शन के लिए भी चर्चित रहे, जिसकी वजह से उन्हें चोट भी लगती रही

    नेहरा को 2003 वर्ल्ड कप में इंग्लैंड के खिलाफ मैच में 23 रन देकर छह विकेट चटकाने के लिए याद किया जाता है। तबियत खराब होने के बावजूद इस मैच में खेले थे। इसके अलावा नेहरा ने 17 टेस्ट, 120 वनडे और 26 टी20 मैच खेले हैं। उन्होंने टेस्ट मैचों में 44, वनडे में 157 और टी-20 में 34 विकेट चटकाए हैं।

    14 साल पहले साल 2003 में अंडर 16 के एक मैच में अच्छा प्रदर्शन करने के लिए आशीष नेहरा ने विराट कोहली को सम्मानित किया था। उस वक्त विराट कोहली 15 साल के बच्चे थे और नेहरा टीम इंडिया के युवा स्टार गेंदबाज थे। यही नहीं जब कोहली गली क्रिकेट खेला करते थे, तब नेहरा टीम इंडिया के स्टार क्रिकेटर्स में से एक थे। इतने सालों बाद अब आशीष नेहरा अपने से 10 साल छोटे कोहली की कप्तानी में 1 नवंबर को अपना आखिरी इंटरनेशनल मैच खेलेंगे।

    1999 में मोहम्मद अजहरुद्दीन की कप्‍तानी में नेहरा का कॅरियर शुरू हुआ। एशियाई टेस्ट चैंपियनशिप में श्रीलंका के खिलाफ उन्‍होंने अपना डेब्‍यू मैच खेला। इसके बाद वो 2 साल के लिए गायब हो गए, फिर सौरव गांगुली उन्हें वापस लेकर आए। यह उस सुनहरे दौर की शुरुआत थी, जब जवागल श्रीनाथ ने नेहरा और बाएं हाथ के एक और यंग गेंदबाज जहीर खान के साथ मिलकर भारत की ओर से अब तक की सर्वश्रेष्ठ तेज गेंदबाजी दिखाई।

    नेहरा और जहीर बल्लेबाजों को परेशान करते थे, जब श्रीनाथ अपना तजुर्बा दिखाते थे। 2003 का विश्‍वकप नेहरा के लिए ऊंचाई छूने वाला मौका था, जब उन्होंने डर्बन के मैच में इंग्लैंड की बल्लेबाजी को बिखेर दिया था इनके अलावा नेहरा ने धौनी, द्रविड़, गंभीर, गांगुली, सहवाग और कोहली की कप्तानी में भी टीम इंडिया की ओर से खेल चुके हैं।

    जवागल श्रीनाथ के संन्यास लेने के बाद नेहरा ने गेंदबजी की बागडोर संभाली, लेकिन इस दौरान उनकी एड़ी, घुटना समेत शरीर के कई हिस्सों का ऑपरेशन होता रहा। बार-बार चोट लगने के बाद नेहरा का पूरा ध्यान वनडे इंटरनेशनल क्रिकेट पर चला गया।

    टेस्ट क्रिकेट की कड़ी मेहनत नेहरा को नहीं पसंद आ रही थी। यह तब दिखा भी, जब उन्होंने 2004 में पाकिस्तान के दौरे पर भारत के लिए अपना आखिरी टेस्ट खेला। नेहरा के कॅरियर का दूसरा दौर तब तक चला, जब तक गांगुली भारत के कप्तान रहे, यानी सितंबर 2005 तक। उस समय भारतीय टीम के कोच ग्रेग चैपल के निशाने पर रहने वाले खिलाड़ियों में नेहरा भी एक थे। अगले चार साल तक नेहरा भारतीय क्रिकेट टीम में नहीं दिखे।

    इसके बाद नेहरा एक बार फिर भुला दिए गए। उस समय ऐसी चर्चा थी कि बीसीसीआई के किसी ताकतवर अधिकारी से उनकी कहासुनी हो गई है। ऐसे में नेहरा की टीम में वापसी अब कभी नहीं हो पाएगी। इस दौरान नेहरा गेंदबाजी करते रहे, चोटिल होते रहे और छोटे फॉर्मेट, विशेषकर आईपीएल में अच्छा परफॉर्मेंस देते रहे। आखिरकार 2015-16 में भारत में टी20 वर्ल्ड कप के आयोजन के समय धौनी उन्हें वापस लेकर आए। नेहरा ने मौके का फायदा उठाया और जिस तरीके से गेंदबाजी हमले की अगुवाई की, वो काबिले तारीफ रही।


    मगर वर्ल्ड कप टी20 में नतीजे भारत की उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे। ऐसा महसूस किया गया कि एक बार फिर नेहरा अलग-थलग हो जाएंगे और वो फिर चोटिल हो गए। बार-बार चोट लगने के बावजूद किस्‍मत से नेहरा वापसी करते रहे। अब 1 नवंबर को अपने घरेलू मैदान पर खेलने के बाद वो संन्‍यास ले लेंगे।


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